आज रात जैसे कटने का
नम नही ले रही है।
जनता हूँ सब व्यर्थ है,
फ़िर भी सोचे ही जाना रहा हूँ।
काश एसा होता,
काश ये न होता।
बस उलझता ही जा रहा हूँ।
कुछ पल के दुरी को
लान्गने में,
अपने को असमर्थ पा रहा हूँ।
तुझे मैं अपने से दूर
करने की कोशिश में,
और भी ज्यादा तन्हा होता जा रहा हूँ।
ख़ुद को क्यों "राज",
कैद करता जा रहा हूँ॥
२३-०२-२००८
