जिन्दगी भर दोड़ते रहे हम जिनके पीछे ,वो पास आकर भी पहलू छुडा गए ।
चाहते थे , नहीं थे कभी हम उनसे बिछुड्ना,
खुद जला कर शमा बुझा गए।
राहे जिन्दगी में मिली गफ्लतें ऐसी ,
प्यार का दवा करके भी,
हाथ आई मंजिल गवां बैठे।
मैं भी चाहता था ऊँचे आकाश में उड़ना,
जो थे वो भी पंख अपने जला बैठे।
यारों के मुकद्दर में राहतें कैसी,
मंजिल तक पहुँचने से पहले ही 'राज',
मकाम गवां बैठे॥
२८ जुलाई ,2003
Last Updated:26-04-2011