Thursday, February 28, 2008

खुशी

कभी - कभी लोग पूछते हैं की मैं खुश क्यों नही हूँ ?
मैं किसी को क्या बताऊ, मैं खुश क्यों नही हूँ ?

भावनाओं का समंदर सूखता जाता रहा,
प्यास चुभती है, मैं खुश नही हूँ।

सामने दरिया है फ़िर भी प्यासा मरता है।
शख्स ऐसों के बीच रहता मैं खुश नही हूँ।

जिन्दगी को सर्द मोम सा पिघलते देखा ,
मैं मौन हूँ, तभी मैं खुश नही हूँ।

झूठी प्यास सी है जिन्दगी, मिटाए नही मिटती ,
किताब-ऐ -जिन्दगी जीता हूँ "राज ",फ़िर भी खुश नही हूँ।।
last updated:26-04-2011

Monday, February 4, 2008

मकाम गवां बैठे

जिन्दगी भर दोड़ते रहे हम जिनके पीछे ,
वो पास आकर भी पहलू छुडा गए ।
चाहते थे , नहीं थे कभी हम उनसे बिछुड्ना,
खुद जला कर शमा बुझा गए।

राहे जिन्दगी में मिली गफ्लतें ऐसी ,
प्यार का दवा करके भी,
हाथ आई मंजिल गवां बैठे।

मैं भी चाहता था ऊँचे आकाश में उड़ना,
जो थे वो भी पंख अपने जला बैठे।

यारों के मुकद्दर में राहतें कैसी,
मंजिल तक पहुँचने से पहले ही 'राज',
मकाम गवां बैठे॥
२८ जुलाई ,2003

Last Updated:26-04-2011