कभी - कभी लोग पूछते हैं की मैं खुश क्यों नही हूँ ?मैं किसी को क्या बताऊ, मैं खुश क्यों नही हूँ ?
भावनाओं का समंदर सूखता जाता रहा,
प्यास चुभती है, मैं खुश नही हूँ।
सामने दरिया है फ़िर भी प्यासा मरता है।
शख्स ऐसों के बीच रहता मैं खुश नही हूँ।
जिन्दगी को सर्द मोम सा पिघलते देखा ,
मैं मौन हूँ, तभी मैं खुश नही हूँ।
झूठी प्यास सी है जिन्दगी, मिटाए नही मिटती ,
किताब-ऐ -जिन्दगी जीता हूँ "राज ",फ़िर भी खुश नही हूँ।।
last updated:26-04-2011
