Monday, March 24, 2008

तन्हाई

इस जिन्दगी की तन्हाई से,

क्यों मन उबता नही।

क्यों ये आश का दिया ,

टूटने पर भी बुझता नही ।

फ़िर कहीं से उम्मीद जगती,

शायद तू आ जाए।

क्यों ये खुली आँखों के सपने,

मन को भट्काए ॥


Date:15-04-2007,Sunday


Last update:26-04-2011