वास्तविकता का अंगीकार



वास्तविकता एक ऐसा शब्द है
जिसे हम प्रयोग तो बहुत करते है
पर अंगीकार नहीं ।

मुझे अपने आस्तित्व
उसकी मर्यादा
उसकी मर्यादाओं का भान है।

अपने आपको नकारात्मक बनाने वाली और
आपसे दूर ले जाने वाली भावनाएं
न मेरा आस्तित्व बन सकती है और
न ही आपको मेरा भविष्य बनने देंगी ।

क्यों न मैं अंगीकार कर लूं
की मेरी सारी भावनाएं एक भरम है
जिसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं।

तभी हम साथ जी सकते हैं
हंस सकते हैं।
दोहरा जीवन जीना सम्भव नहीं।
बस वास्तिवकता का अंगीकार जरूरी है।

मैं हूँ, अकेला हूँ
आपका साथ मिले या न मिले ये भाव जरूरी है।
हर बार आपके लिए मन में दुआ ही निकलती है।
जहां हो सुखी रहो
अपनी पूर्णता को जियो।
इसका जश्न मनाओ।

यही जीवन का अर्थ है
वास्तविकता का स्वीकार ही मेरे जीवन का सत्य है।

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