दिल , दिमाग और आंसू






आजकल दिल और दिमाग मे ही उलझा पड़ा हूँ
दिमाग के हावी होने पर दिल शांत हो जाता है
आपकी हर बात को गौर से सुनता
उसे मानने के लिए कोशिश करता है।

सब अच्छा अच्छा लगता है
सकून भरा
मीठे अहसास जैसे
जो आपके पास होने पर होता है
और दूर जाने पर भी टूटने नहीं देता।

पर आपके सामने
ये आंसूं पता नहीं कैसे आ जाते है।
भावनाओं को तो रोक लेता हूँ
दबा लेता हूँ
पर ये आंसूं आपसे झूठ नहीं बोल पाते।

कि कितना ही दिमाग चला लूं
कितना ही दिल को दबा लूं
भावनाएं मरती नहीं हैं
सिर्फ नियन्त्रित हो जाती हैं।


तब तक
जब तक आप सामने नहीं आते
आंखे आपको अपने में समा नही लेती,
और दिल सिहर न उठे।

दिल आंखों का सहारा ले
सब कुछ निकाल देता है
क्योंकि वो जो आपके सामने है
किसी के सामने  नहीं है।
झूठ कैसे दिखाऊं
सच कैसे छूपाऊँ?

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